बुधवार, 1 अप्रैल 2009

50 प्रधानमंत्री बन सकते हैं

50 प्रधानमंत्री बन सकते हैं
वर्तमान शासन प्रणाली को लेकर देष में पिछले काफी अर्से से बहस जारी है। वर्ष 1996 के आम चुनाव से पहले तो तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन तक ने देष में शासन के लिए संसदीय प्रणाली के स्थान पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली की वकालत कर दी थी। अर्सा पहले बतौर पत्रकार अरुण शौरी ने विभिन्न देषों की शासन प्रणालियों का विष्लेषण करने के बाद भारतीय संदर्भ में संसदीय प्रणाली को ही उपयुक्त बताया था। कांग्रेस के दिवंगत नेता वसंत साठे तो कई बार देष में राष्ट्रपति शासन प्रणाली की पैरवी करते रहे थे। यह भी कम दिलचस्प बात नहीं है कि गत छह आम चुनावों में किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। और शायद यही वजह है कि मीडिया ने लोगों में इस धारणा को पनपा दिया है कि अब गठबंधन का दौर भारत में शुरू हो गया है।
देष की शासन प्रणाली पर जारी इस बहस में एक बात यह उभरी कि प्रत्येक ने विष्व में मौजूद किसी भी एक शासन प्रणाली की भारतीय संदर्भ में कल्पना कर उसे ही उचित अथवा अनुचित बताया। वास्तव में होना यह चाहिए कि इसके लिए किसी भारतीय प्रणाली को विकसित किया जाए। लेकिन इसकी जरूरत शायद इसलिए नहीं समझी गई क्योंकि ऐसी हालत में अंग्रेजों की शासन करने की आसान नीति ‘फूट डालो राज करो’ कारगर साबित नहीं हो पाती। देष-दुनिया में जारी लोकतंत्र की बदौलत हर देष में कमोबेष इसी नीति के अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे।
गत लोकसभा चुनाव में किसी भी एक दल को इतनी सीटें नहीं मिल पाई थी कि वह अपने बूते सरकार बना ले। वैसे यह हालत वर्ष 1989 के 9वें आम चुनाव के बाद से ही है कि कोई एक पार्टी बिना किसी का समर्थन लिए सरकार का गठन कर ले। तब से ही यह स्पष्ट होने लगा था कि संसदीय प्रणाली से इस देष पर शासन करना अधिक हानिकर है क्योंकि यदि यह शासन प्रणाली उपयुक्त होती तो सन् 1989 से लेकर 1999 तक के बीच अर्थात् केवल करीब 10 वर्ष के समय में पांच बार आम चुनाव का सामना नहीं करना पड़ता।
भारत में जो वर्तमान शासन प्रणाली है वह कमोबेष ब्रिटेन की संसदीय शासन प्रणाली की नकल है। यह प्रणाली ब्रिटेन के लिए तो उपयुक्त मानी जा सकती है। इसे वहां उपयुक्त मानने के बहुत से कारण हो सकते हैं फिर भी मुख्य रूप से वहां साक्षरता का प्रतिषत हमारे देष से कहीं अधिक होने के अलावा राजनीतिक दलों का सीमित संख्या में होना प्रमुख कारण माने जा सकते हैं। लेकिन जैसा कि माना जाता रहा है और गाहे-बगाहे इसे जताया भी जाता रहा है कि यह देष भारत अनेकताओं को लिए हुए है- जैसे कि प्रत्येक 100 किलोमीटर पर बोली-भाषा का बदल जाना। इसी तरह देष के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पष्चिम में रहन-सहन के साथ खानपान और पहनावे में जमीन-आसमान का अंतर आ जाना प्रमुख हैं। इन सब कारणों से यह महससू किया जाने लगा है कि संसदीय शासन प्रणाली तब ही उपयुक्त मानी जा सकती है जबकि देष में भौगोलिक भाषाई और सांस्कृतिक परिस्थितियों में अल्पदलीय व्यवस्था की संभावना बनती दिखाई देती हो अन्यथा नहीं।
भारतीय परिपे्रक्ष्य में गौर करने लायक बात यह है कि भारत की विविधताओं को मद्देनजर रखते हुए ही देष में राजनीतिक दलों की संख्या है। गत लोकसभा चुनाव में जितने राजनीतिक दलों के प्रत्याषियों को विजय मिली वह संभवतः एक रेकार्ड है और विष्व के किसी भी लोकतंत्र में शायद इतने राजनीतिक दलों की भागीदारी नहीं रही। यह भी कम खास बात नहीं है कि देष में करीब चार दर्जन राजनीतिक दल मौजूद हैं। इतना ही नहीं ऐसी भी राजनीतिक पार्टियां मौजूद हैं जिसका कोई भी सदस्य गत चुनाव में जीत नहीं पाया। कई ऐसी शख्सियतें हैं जिन्होंने अपने ही बूते पर पार्टी बना रखी है तथा इसका संसद में प्रतिनिधित्व भी वे स्वयं अकेले ही करते हैं।
संसदीय प्रणाली को ध्यान में रखकर यदि यह कल्पना की जाए कि देष में मौजूद सभी दल किसी चुनाव में समान प्रदर्षन की स्थिति में हो जाएं तो? तब देष के प्रधानमंत्री पद के करीब 50 उम्मीदवार हो सकने की संभावना बनती है क्योंकि सभी पार्टियों के समान प्रदर्षन करने पर हर पार्टी के करीब 10 सांसद ही हो सकते हैं।इन बातों पर गौर करने पर जो निष्कर्ष निकलता है वह यह कि देष को जरूरत है एक ऐसी भारतीय तरीके की शासन प्रणाली की ताकि देष की अधिसंख्य गरीब जनता को बार-बार के चुनावी खर्च का सामना नहीं करना पड़े। साथ ही हर बार त्रिषंकु संसद की स्थिति नहीं बने और मजबूर और असहाय प्रधानमंत्री हर किसी दल अथवा सांसद से ब्लैकमेल न होता रहे। देष में मौजूद विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए मैंने एक नई भारतीय शासन प्रणाली की रूपरेखा तैयार की हुई है। यदि आप इस बाबद जानने को उत्सुक हों तो कृपया लिखें।

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