सोमवार, 31 मई 2010

ग्लोबल वार्मिंग : गधों का गुलाब जामुन खाना

ग्लोबल वार्मिंग:
गधों का गुलाब जामुन खाना
अभी तक यही धारणा रही थी कि मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था के चलते केवल हिंदुस्तान में ही गधे गुलाब जामुन खाने का मजा ले रहे हैं, लेकिन पिछले दिनों ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर कोपेनहेगन में हुए सम्मेलन के बारे में जानने के लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं को खंगालने के बाद हकीकत पर दृष्टिपात करना शुरू किया तो लगा कि दुनियाभर में ही गधे बिना किसी परेशानी के गुलाब जामुन खाने का मजा ले रहे हैं। और इसका सबसे अहम कारण है दुनियाभर में स्थापित की जा चुकी मौजूदा व्यवस्था। यह कहना कहीं से भी गलत नहीं होगा कि इस व्यवस्था की बदौलत ही देश-दुनिया में नक्सलवाद और आतंकवाद जैसी इंसानियत की दुश्मन कार्रवाइयां दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से अंजाम दी जाने लगी हैं। मेरी इस बात से अनेक लोग खफा हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें यह नागवार लगेगा कि दुनिया के तमाम बुद्धिजीवियों को ऐसी संज्ञा दी गई है। वैसे यह बात इसलिए कही गई है, क्योंकि यदि ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर कोपेनहेगन में हुई चर्चा की ही बात करें तो इस मुद्दे पर कोई सार्थक निष्कर्ष निकालने के स्थान पर यह जिम्मेदारी दूसरों पर थोपने का काम किया गया। और यही है इस मौजूदा व्यवस्था की खामी, कि किसी भी मुद्दे को तब तक लटका दिया जाए जब तक कि वह विकराल रूप में सामने नहीं आए। इस विषय पर चर्चा किए जाने की जो खास बात रही वह यह कि इसके लिए कथित रूप से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को जिम्मेदार ठहराया गया। अब भला आम आदमी को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इसके लिए तो व्यवस्था स्वयं ही जिम्मेदार है, जिसने अपने लोगों को भौतिक सुविधाएं मुहैया करवाने के उद्देश्य से प्रकृति से खिलवाड़ करना शुरू किया था।
दुनिया में येन-केन प्रकारेण (यदि यह कहा जाए कि साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपना कर तो भी गलत नहीं होगा) स्थापित की गई मौजूदा व्यवस्था की विषेषता यह है कि हर उस कारण अथवा समस्या के लिए ऐसे कारकों को जिम्मेदार बता दिया जाता है, जिसके बारे में आम आदमी सिर्फ कल्पना ही कर सकता है कि यदि ऐसा होता है तो यूं होता है और यदि वैसा होता तो क्या होता। इस बारे में यदि वह किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करे तो उसे कुछ भी हाथ नहीं लगे। धरती का तापमान बढ़ने जैसे मुद्दे का यदि सरलीकरण किया जाता तो उसे समझाना और आम आदमी का इसे समझ पाना आसान हो सकता है, लेकिन इस तरह की कोई कोशिश करने के स्थान पर उसे कथित वैज्ञानिक तरीके से लोगों को समझाने की कोशिश की गई है और की जा रही है। इसी का नतीजा है कि हर साल दो साल बाद दुनियाभर के तमाम बुद्धिजीवी ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा होकर अपना-अपना राग अलापते हैं, लेकिन जब जिम्मेदारी तय करने का समय आता है तो इसे अगली बैठक के एजेंडे के तौर पर छोड़ दिया जाता है।
ऐसा होने अथवा किए जाने का एकमात्र कारण यह है कि कोई भी विकसित देश अपने हितों की अनदेखी कर इसकी वजह से मिलने वाले लाभ को नहीं छोड़ना चाहता है, भले ही इस दुनिया का बेड़ा ही गर्क क्यों न हो जाए। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हर एक विकसित देश न सिर्फ अपने देश में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन कर रहा है बल्कि अपने प्रभाव, पहुँच और तिकड़म के बूते वह इतर देशों के संसाधनों का दोहन करने से भी नहीं चूक रहा है। ऐसा करते हुए उसकी बस यही लालसा रहती है कि देश और दुनिया में कथित रूप से अपना प्रभाव बढ़ाया जाए। खैर मुख्य विषय से अलग नहीं हटते हुए फिर से गधों के गुलाब जामुन खाने पर लौटा जाए और ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर बात को आगे बढ़ाया जाए। यदि भारतीय संदर्भ में बात की जाए तो ग्लोबल वार्मिंग का सबसे खास और अहम कारण है धरती में मौजूद पानी का निरंतर दोहन किया जाना है।
इसे संक्षिप्त में इस तरह से समझाया जा सकता है कि धरती में मौजूद पानी को निकालने के लिए सबसे पहले सर्वाधिक प्रचलित साधन था कुआं खोदना। कुआं खोदने जैसा श्रमसाध्य अब काम हर कोई तो अंजाम दे नहीं सकता था और साथ ही पहले की पीढ़ी इस बात से भली-भांति अवगत थी कि एक बार जमीन में मौजूद पानी का यदि दोहन कर लिया तो उसे फिर से धरती में पहुंचाना आसान नहीं होगा। उस समय तक नगर पालिका या नगर निगम भी कुछ बड़े शहरों में ही पानी का वितरण करते थे। इसलिए छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में आदमी को अपने और परिवार के उपयोग के लिए पानी कुएं से स्वयं खींचना पड़ता था और कुएं से पानी खींचना कोई कम श्रमसाध्य काम नहीं है। इन सभी कारणों के चलते पानी का उपयोग किफायत से किया जाता रहा था।
इसके बाद आया हैंडपंप के जरिये धरती में से पानी का दोहन किए जाने का दौर। कम लागत में पानी की उपलब्धता हो जाने की इस तकनीक को स्थानीय प्रशासन ने भी बिना कुछ सोचे अपनाकर छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में अंधाधुंध हैंडपंप खनन करवा दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि धरती में मौजूद भूजल स्तर में लगातार गिरावट आने लगी, लेकिन प्रशासन इसे कम वर्षा होने की बात कहकर अनदेखा करता रहा। इन सबके चलते लोगों के गाढ़े पसीने की कमाई से लगाए गए हैंडपंपों में से अधिकांश अब लावारिस होकर रह गए हैं। उधर देखरेख के अभाव अथवा अत्यधिक दोहन किए जाने के अलावा पिछले 50 वर्षों के दौरान विज्ञान के प्रसार के चलते उन्नत तकनीक के जरिये पंप और सबमर्सिबल पंप से धरती में से पानी निकालने की जो होड़ शुरू हुई है, उसने ही हालात को इतना भयावह बना दिया है कि देष में कई स्थानों पर हजार फीट की खुदाई करने के बाद भी पानी नसीब नहीं हो पा रहा है।
अब बात की जाए ग्लोबल वार्मिंग की। इसका एक कारण तो भूजल स्तर का कम होना है। कुछ वर्षों पहले तक देश के रेगिस्तानी इलाकों में भूजल का स्तर जब कुछ सौ फीट था और शेष स्थानों पर कुछ फीट खोदने पर पानी निकलना शुरू हो जाता था। तब गर्मी का मौसम आने से कुछ समय पहले तक छोटी-बड़ी सभी नदियों में पानी की मौजूदगी दिखाई देती थी। उस समय कमोबेश पूरे देश में भरपूर वर्षा इसलिए संभव हो पाती थी, क्योंकि गर्मी के मौसम में सूर्य की किरणें धरती की ऊपरी सतह पर मौजूद पानी का वाष्पीकरण करना शुरू कर देती थी। वाष्पीकरण की इस प्रक्रिया के कारण एक तरफ तो गर्मी की प्रचंडता का अहसास नहीं हो पाता था और साथ ही पर्याप्त वाष्पीकरण होने की वजह से बारिश भी भरपूर होती थी। उस समय गर्मी के मौसम में राजस्थान के कई इलाकों में तापमान 47 से 48 और कभी-कभी 50 डिग्री की छूने को बेताब होने लगता था, लेकिन गर्मी की इतनी तपन तब कभी महसूस नहीं हो पाती थी, जितनी अब तापमान के केवल 40 डिग्री को पार करने पर होने लगती है। इसे समझने के लिए यदि यह उदाहरण दिया जाए कि चूल्हे पर किसी खाली बर्तन को चढ़ा दिए जाने पर कुछ क्षण (एक मिनट का समय तो अधिक होगा) बाद उसे हाथ से पकड़ना मुश्किल हो जाएगा, जबकि यदि बर्तन पानी अथवा किसी तरल पदार्थ से भरा है तो उसे बिना किसी सहायता के उठाया अथवा पकड़ा जा सकता है। मौजूदा समय में धरती की हालत भी चूल्हे पर रखे किसी खाली बर्तन की तरह की हो गई है।
ग्लोबल वार्मिंग का दूसरा बड़ा कारण है कुछ लोगों का सुविधाभोगी जीवन जीना। जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया है कि गर्मी के मौसम में सूर्य की प्रचंडता अब भी उतनी ही रहती है, जितनी कि आज से सौ-पचास अथवा डेढ़ सौ साल पहले रहा करती थी, लेकिन तब सभी उतनी ही गर्मी में रहने को विवश इसलिए थे, क्योंकि तब तक भौतिक रूप से वातानुकूलन (एयरकंडीशनर) जैसी किसी तकनीक का विकास नहीं हुआ था, लेकिन जब से भौतिक रूप से वातानुकूलन (एयरकंडीशनर) जैसी और इसी तरह की अन्य तकनीकी विकसित हुई है, इसके साथ ही लोगों में सुविधाभोगी जीवन जीने की लालसा बढ़ी है, तब से सुविधाभोगी लोगों ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर आम आदमी के लिए गर्मी की तपन में इजाफा ही किया है। उनके द्वारा वातानुकूलन (एयरकंडीशनर) को अपनाने से भले ही उनका घर अथवा कार्यस्थल ठंडा हो गया हो, लेकिन वहां की गर्मी ने वहां से निकलकर बाहर की गर्मी को बढ़ा दिया है। अब हालात यह हैं कि लोगों द्वारा जैसे-जैसे भौतिक रूप से वातानुकूलन (एयरकंडीशनर) अथवा कूलर अपनाए जा रहे हैं, वैसे-वैसे गर्मी की प्रचंडता में लगातार बढ़ोत्री होती जा रही है।
इसके अलावा पेड़-पौधों के साथ जंगल का स्थान अब सीमेंट-कॉन्क्रीट के भवनों ने ले लिया है। गर्मी की तपन को रोकने में पेड़-पौधों और जंगलों का विशेष योगदान यह रहा करता था कि वे सूर्य की गर्मी को अवशोषित कर लिया करते थे। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज भी देखा जा सकता है कि जिस स्थान पर पेड़-पौधों का घनत्व अधिक है, वहां का तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी लगातार की जा रही है। इतना ही नहीं पेड़-पौधों का स्थान ले चुके सीमेंट-कॉन्क्रीट के भवन सूर्य की इस तपन को रोकने अथवा अवषोषित करने के बजाय उस गर्मी को परावर्तित करते हैं। इसी का नतीजा है कि अब दिन के बढ़ने के साथ-साथ सूर्य की तपन में लगातार इजाफा होता जाता है। रही-सही कसर इन दिनों बनने वाली सीमेंट-कॉन्क्रीट की सड़कों और राजमार्गों ने पूरी कर दी है। विज्ञान ने भले ही कुछ आदमियों के लिए सुविधापूर्ण जीवन जीना आसान बनाया हो, लेकिन आम आदमी का जीना भी इसी विज्ञान ने दुश्वार कर दिया है। यदि यह कहा जाए कि विज्ञान की प्रगति ने इंसान-इंसान के बीच मौजूद नैसर्गिक समाजवाद को छिन्न-भिन्न कर दिया है तो इसे कहीं से भी गलत नहीं माना और कहा जाना चाहिए। अब ग्लोबल वार्मिंग अर्थात धरती का तापमान बढ़ने की इस सीधी सी बात के लिए वैज्ञानिक जिस तरह की भाषा का उपयोग कर रहे हैं, उससे लोगों को अवगत कराने के लिए सदियां नही तो दशकों तक के समय की जरूरत तो होगी ही ना।
दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर जताई जा रही चिंताओं और की जा रही विभिन्न घोषणाओं के बावजूद इसकी भीषणता से पड़ने वाले दुष्प्रभाव से लोगों को जागरूक करने की दिषा में कोई कदम नहीं उठाया जाना निःसंदेह चिंताजनक माना जाना चाहिए। इन्हीं सब कारणों से आहत होकर इस आलेख में सभी देशों के कर्ताधर्ताओं को गधा मानते हुए उनके द्वारा गुलाब जामुन खाए जाने (मौज उड़ाने) की संज्ञा दी गई है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

रिलायंस फ्रेश की बदौलत बढ़ी है देश में महंगाई

आम आदमी का जीना मुहाल कर देने वाली महंगाई पर तरह-तरह के विश्लेषण किए गए हैं लेकिन किसी ने भी यह जहमत उठाने की कोशिश नहीं की है कि आखिर हमारे देश में प्रचुर उत्पादन के बावजूद एकाएक शक्कर के साथ अन्य सभी खाद्य पदार्थों की कीमतों में क्यों बढ़ोत्री हुई है। कुछ दिन पहले जब रिलायंस फ्रेश के सर्वेसर्वा मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि उनकी कंपनी जल्द ही दूध का कारोबार भी शुरू करेगी. तब माथा ठनका और महंगाई बढ़ने का कारण समझ में आने लगा। मुकेश की इस घोषणा के एक-दो दिन बाद ही कृषि मंत्री की तरफ से यह बयान आ गया कि उत्तर भारतीय इलाकों में दूध के उत्पादन में कमी हुई है लिहाजा कभी भी दूध के दाम बढ़ सकते हैं। कृषि मंत्री का यह बयान देना था कि अचानक शक्कर लॉबी की तरह मजबूत होती जा रही दूध लॉबी ने भी दामों को बढ़ा दिया और आम आदमी मन मसोसकर रह गया। वह बेचारा कर ही क्या सकता है सिर्फ सरकार के साथ अपने भाग्य को कोसने के।
अभी से करीब 3 साल पहले तक मौसम की मार से या किसी प्राकृतिक आपदा की बदौलत देश में किसी एकाध कृषि उपभोक्ता वस्तु की कीमतों में बढ़ोतरी हो जाया करती थी, मसलन कभी प्याज तो कभी आलू या फिर कोई भी दाल-दलहन। ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मौसम अथवा प्राकृतिक आपदा के कारण सभी खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई हो, लेकिन बीते 3 वर्षों में देश में पैदा होने वाली लगभग सभी कृषि जीन्सों की भरपूर पैदावार होने के बावजूद फसल आने के समय भी दामों में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं दे रही है। यदि कभी-कभार ऐसी स्थिति बनती भी है तो कृषि मंत्री यह बयान देकर पूरी कर देते हैं कि मौसम की मार से कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है और दामों में बढ़ोत्री होना संभव है। उनका यह बयान देना होता है कि बाजार से एकाएक उस कृषि जीन्स की मांग बढ़ जाती है और कल तक जो सर्व-सुलभ वस्तु थी, वह गायब हो जाती है। इस बात के लिए कृषि मंत्री को चुनौती दी जा सकती है कि वे बताएं कि कौन से वर्ष में कृषि आधारित सभी फसलों की कमी की वजह से हर उत्पाद के दामों में दो गुनी तक वृद्धि हुई थी। यदि वे इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं तो यही माना जाना चाहिए कि उन्होंने इरादतन किसी उद्योग घराने को लाभ पहुंचाने की खातिर और देश की जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से ऐसे बयान देकर आम आदमी को महंगाई की आग में झोंका है। लोकतंत्र के चौथे महत्वपूर्ण स्तंभ कहे जाने वाले आत्ममुग्ध मीडिया के किसी भी संस्करण (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) ने इस बात के लिए कृषि मंत्री से सवाल तक करना जरूरी समझा है कि आखिर कौन से कारण रहे हैं जिनकी बदौलत लगातार तीन साल से सरकार और खासकर कृषि मंत्री महंगाई थामने में विफल रहे हैं। कृषि मंत्री का यह कह देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता और न ही वे अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर बच सकते हैं कि सभी फैसले कैबिनेट की सहमति से होते हैं इसलिए महंगाई के लिए अकेले उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वैसे उनके बयान का मतलब यह भी निकलता है कि सरकार के सभी नुमाइंदों की जनता को गुमराह करने में शामिल हैं।
गौरतलब है कि 30 सितंबर 2006 को मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि वे अपने परंपरागत उद्योग-धंधों के साथ अब देश में मौजूद विषाल खुदरा बाजार में तेल-गुड़ के साथ फल-सब्जी भी बेचना शुरू करेंगे। खुदरा बाजार पर अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्होंने 4 साल के अंदर 25 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बनाई थी। यदि इस निवेश को आसान शब्दों में समझाना हो तो इसका मतलब यह निकलता है कि हर भारतीय पर कम से कम 22 सौ रुपए का निवेश किया। इस योजना के मुताबिक देश के 14 प्रदेशों के खास 80 शहरों में 50 लाख उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता का खाद्य सामान उपलब्ध करवाने के लिए 900 से अधिक स्टोर खोले जाने का लक्ष्य था। उनके द्वारा निर्धारित समय की सीमा पूर्ण होने में अभी तकरीबन 6 माह का समय और बचा है. लेकिन इन साढ़े तीन सालों में महंगाई ने अपना असली रूप दिखा दिया है और देश की तकरीबन 20 फीसदी आबादी को दाने-दाने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। केवल 50 लाख लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए रिलायंस फ्रेश के इस व्यापार में कूद जाने से अब हालात कितने भयावह हो गए हैं।
यहां यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि वर्ष 2006-07 में मुंबई की प्रति व्यक्ति आय 65 हजार 361 रुपए थी, जो देश की औसत प्रति व्यक्ति आय 29 हजार 382 रुपए के मुकाबले दोगुनी होती है। देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद अकेले मुंबई की दस फीसदी आबादी (करीब 10 लाख लोग) की आय 20 रुपए प्रतिदिन भी नहीं, बल्कि केवल 591.75 पैसे ही है। ऐसे परिवारों के पास टीवी, फ्रिज, पंखा तो दूर की बात है घरों शौचालय, पानी की आपूर्ति का स्रोत अथवा अपना वाहन तक की कोई सुविधा नहीं है। ऐसे में देश के केवल 50 लाख लोगों को सुविधाएं देने नाम पर 25 हजार करोड़ रुपए के निवेश के जरिए आम आदमी को महंगाई की भट्टी में झोंक देने को क्या कहा जाएगा।
मेरे दूध लॉबी की अवधारणा से अनेक को आपत्ति हो सकती है, लेकिन जिस तरह से दूध का धंधा शहरों और कस्बों में फैला है और जिस तरह से शासन-प्रशासन उनके सामने घुटने टेकने को मजबूर रहता है, उससे इस लॉबी की विशालता पता चलता है। दोपहिया वाहन पर जिस तरह से दूध की कम से कम दो बड़ी-बड़ी टंकियां (अधिकतम की 4 से 6 तक) लादकर जिस तरह भीड़ भरे ट्राफिक में से गुजर कर इस लॉबी के कर्ता-धर्ता अपने काम को बेखौफ हो अंजाम देते हैं, उस देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि शहर-कस्बे में यातायात पुलिस प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था भी है। ऐसा भी नहीं है कि ये नजारे केवल छोटे-मोटे कस्बे अथवा शहर के हों, कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में इन नजारों को देखा और महसूस किया जा सकता है। क्या यातायात नियमों में दोपहिया वाहन पर दूध की टंकियां लादने को छूट दी गई है?
मीडिया में बेकाबू होती महंगाई पर खूब लिखा जा चुका है, लेकिन खास बात यह है कि किसी ने भी इसका विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों तक को दरकिनार कर दिया है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत के अनुसार बाजार में मांग और धन का प्रवाह बढ़ने पर मुद्रास्फीति की दर के साथ महंगाई में भी बढ़ोत्री होती है लेकिन कुछ माह पहले (गत वर्ष जून में) तक तो मुद्रास्फीति की दर ऋणात्मक थी, बावजूद इसके बाजार में न सिर्फ कृषि उत्पाद मसलन दाल, चावल, शक्कर और अनाज की कीमत में कोई कमी दिखी। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले मुद्रास्फीति की ऋणात्मक दर वर्ष 1978 के आसपास हुई थी और उस समय शक्कर सहित अन्य सभी कृषि आधारित वस्तुओं की कीमतें बेहद कम हो गई थी। आपातकाल के दौरान भी शक्कर की कीमत काफी बढ़ी हुई थी और राशन दुकानों पर कम कीमत पर शक्कर उपलब्ध कराई जाती थी। उस समय (वर्ष 1978) ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने शक्कर की कीमतों को राशन दुकान पर उपलब्ध कीमत से भी कम पर ला दिया था लेकिन इस बार की ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने ऐसा कोई कारनामा अंजाम नहीं दिया उल्टे सभी वस्तुओं के दाम स्थिर ही बने रहे। मतलब यह कि मतलब यह कि जिस तेजी से कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही थी, केवल उनका बढ़ना भर रुका था। इसका कारण साफ था कि यह सब जमाखोरी के चलते संभव हो पाया था और आज भी सरकार इस पर अंकुश लगा पाने में पूरी तरह नाकामयाब ही दिखती है वह केवल लोगों को यह बयान देकर अपने कर्तव्य को पूरा करने में लगी है कि सरकार द्वारा महंगाई को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं जल्द ही लोगों को महंगाई से निजात मिलेगी लेकिन ठोस उपाय करने के नाम पर मौद्रिक नीति में थोड़ा उलटफेर कर दिया जाता है।
महंगाई के मुद्दे पर सभी दलों की खामोशी ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि शासन करने की मौजूदा नीति केवल उद्योगपतियों के साथ नेताओं और अफसरों के लिए ही फायदेमंद साबित हो रही है, आम आदमी तो बस जल्द ही अपने गरीबी की रेखा में आने का इंतजार कर रहा है और तैसे-तैसे अपने दिन गुजारने को मजबूर है. मौजूदा महंगाई में सामान्य आदमी अपना गुजारा कैसे चला पा रहा है, यह उससे बेहतर और कोई नहीं जान सकता है और शासन-प्रशासन ने जनता को तो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है.