मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

रिलायंस फ्रेश की बदौलत बढ़ी है देश में महंगाई

आम आदमी का जीना मुहाल कर देने वाली महंगाई पर तरह-तरह के विश्लेषण किए गए हैं लेकिन किसी ने भी यह जहमत उठाने की कोशिश नहीं की है कि आखिर हमारे देश में प्रचुर उत्पादन के बावजूद एकाएक शक्कर के साथ अन्य सभी खाद्य पदार्थों की कीमतों में क्यों बढ़ोत्री हुई है। कुछ दिन पहले जब रिलायंस फ्रेश के सर्वेसर्वा मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि उनकी कंपनी जल्द ही दूध का कारोबार भी शुरू करेगी. तब माथा ठनका और महंगाई बढ़ने का कारण समझ में आने लगा। मुकेश की इस घोषणा के एक-दो दिन बाद ही कृषि मंत्री की तरफ से यह बयान आ गया कि उत्तर भारतीय इलाकों में दूध के उत्पादन में कमी हुई है लिहाजा कभी भी दूध के दाम बढ़ सकते हैं। कृषि मंत्री का यह बयान देना था कि अचानक शक्कर लॉबी की तरह मजबूत होती जा रही दूध लॉबी ने भी दामों को बढ़ा दिया और आम आदमी मन मसोसकर रह गया। वह बेचारा कर ही क्या सकता है सिर्फ सरकार के साथ अपने भाग्य को कोसने के।
अभी से करीब 3 साल पहले तक मौसम की मार से या किसी प्राकृतिक आपदा की बदौलत देश में किसी एकाध कृषि उपभोक्ता वस्तु की कीमतों में बढ़ोतरी हो जाया करती थी, मसलन कभी प्याज तो कभी आलू या फिर कोई भी दाल-दलहन। ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मौसम अथवा प्राकृतिक आपदा के कारण सभी खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई हो, लेकिन बीते 3 वर्षों में देश में पैदा होने वाली लगभग सभी कृषि जीन्सों की भरपूर पैदावार होने के बावजूद फसल आने के समय भी दामों में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं दे रही है। यदि कभी-कभार ऐसी स्थिति बनती भी है तो कृषि मंत्री यह बयान देकर पूरी कर देते हैं कि मौसम की मार से कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है और दामों में बढ़ोत्री होना संभव है। उनका यह बयान देना होता है कि बाजार से एकाएक उस कृषि जीन्स की मांग बढ़ जाती है और कल तक जो सर्व-सुलभ वस्तु थी, वह गायब हो जाती है। इस बात के लिए कृषि मंत्री को चुनौती दी जा सकती है कि वे बताएं कि कौन से वर्ष में कृषि आधारित सभी फसलों की कमी की वजह से हर उत्पाद के दामों में दो गुनी तक वृद्धि हुई थी। यदि वे इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं तो यही माना जाना चाहिए कि उन्होंने इरादतन किसी उद्योग घराने को लाभ पहुंचाने की खातिर और देश की जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से ऐसे बयान देकर आम आदमी को महंगाई की आग में झोंका है। लोकतंत्र के चौथे महत्वपूर्ण स्तंभ कहे जाने वाले आत्ममुग्ध मीडिया के किसी भी संस्करण (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) ने इस बात के लिए कृषि मंत्री से सवाल तक करना जरूरी समझा है कि आखिर कौन से कारण रहे हैं जिनकी बदौलत लगातार तीन साल से सरकार और खासकर कृषि मंत्री महंगाई थामने में विफल रहे हैं। कृषि मंत्री का यह कह देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता और न ही वे अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर बच सकते हैं कि सभी फैसले कैबिनेट की सहमति से होते हैं इसलिए महंगाई के लिए अकेले उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वैसे उनके बयान का मतलब यह भी निकलता है कि सरकार के सभी नुमाइंदों की जनता को गुमराह करने में शामिल हैं।
गौरतलब है कि 30 सितंबर 2006 को मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि वे अपने परंपरागत उद्योग-धंधों के साथ अब देश में मौजूद विषाल खुदरा बाजार में तेल-गुड़ के साथ फल-सब्जी भी बेचना शुरू करेंगे। खुदरा बाजार पर अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्होंने 4 साल के अंदर 25 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बनाई थी। यदि इस निवेश को आसान शब्दों में समझाना हो तो इसका मतलब यह निकलता है कि हर भारतीय पर कम से कम 22 सौ रुपए का निवेश किया। इस योजना के मुताबिक देश के 14 प्रदेशों के खास 80 शहरों में 50 लाख उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता का खाद्य सामान उपलब्ध करवाने के लिए 900 से अधिक स्टोर खोले जाने का लक्ष्य था। उनके द्वारा निर्धारित समय की सीमा पूर्ण होने में अभी तकरीबन 6 माह का समय और बचा है. लेकिन इन साढ़े तीन सालों में महंगाई ने अपना असली रूप दिखा दिया है और देश की तकरीबन 20 फीसदी आबादी को दाने-दाने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। केवल 50 लाख लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए रिलायंस फ्रेश के इस व्यापार में कूद जाने से अब हालात कितने भयावह हो गए हैं।
यहां यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि वर्ष 2006-07 में मुंबई की प्रति व्यक्ति आय 65 हजार 361 रुपए थी, जो देश की औसत प्रति व्यक्ति आय 29 हजार 382 रुपए के मुकाबले दोगुनी होती है। देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद अकेले मुंबई की दस फीसदी आबादी (करीब 10 लाख लोग) की आय 20 रुपए प्रतिदिन भी नहीं, बल्कि केवल 591.75 पैसे ही है। ऐसे परिवारों के पास टीवी, फ्रिज, पंखा तो दूर की बात है घरों शौचालय, पानी की आपूर्ति का स्रोत अथवा अपना वाहन तक की कोई सुविधा नहीं है। ऐसे में देश के केवल 50 लाख लोगों को सुविधाएं देने नाम पर 25 हजार करोड़ रुपए के निवेश के जरिए आम आदमी को महंगाई की भट्टी में झोंक देने को क्या कहा जाएगा।
मेरे दूध लॉबी की अवधारणा से अनेक को आपत्ति हो सकती है, लेकिन जिस तरह से दूध का धंधा शहरों और कस्बों में फैला है और जिस तरह से शासन-प्रशासन उनके सामने घुटने टेकने को मजबूर रहता है, उससे इस लॉबी की विशालता पता चलता है। दोपहिया वाहन पर जिस तरह से दूध की कम से कम दो बड़ी-बड़ी टंकियां (अधिकतम की 4 से 6 तक) लादकर जिस तरह भीड़ भरे ट्राफिक में से गुजर कर इस लॉबी के कर्ता-धर्ता अपने काम को बेखौफ हो अंजाम देते हैं, उस देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि शहर-कस्बे में यातायात पुलिस प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था भी है। ऐसा भी नहीं है कि ये नजारे केवल छोटे-मोटे कस्बे अथवा शहर के हों, कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में इन नजारों को देखा और महसूस किया जा सकता है। क्या यातायात नियमों में दोपहिया वाहन पर दूध की टंकियां लादने को छूट दी गई है?
मीडिया में बेकाबू होती महंगाई पर खूब लिखा जा चुका है, लेकिन खास बात यह है कि किसी ने भी इसका विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों तक को दरकिनार कर दिया है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत के अनुसार बाजार में मांग और धन का प्रवाह बढ़ने पर मुद्रास्फीति की दर के साथ महंगाई में भी बढ़ोत्री होती है लेकिन कुछ माह पहले (गत वर्ष जून में) तक तो मुद्रास्फीति की दर ऋणात्मक थी, बावजूद इसके बाजार में न सिर्फ कृषि उत्पाद मसलन दाल, चावल, शक्कर और अनाज की कीमत में कोई कमी दिखी। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले मुद्रास्फीति की ऋणात्मक दर वर्ष 1978 के आसपास हुई थी और उस समय शक्कर सहित अन्य सभी कृषि आधारित वस्तुओं की कीमतें बेहद कम हो गई थी। आपातकाल के दौरान भी शक्कर की कीमत काफी बढ़ी हुई थी और राशन दुकानों पर कम कीमत पर शक्कर उपलब्ध कराई जाती थी। उस समय (वर्ष 1978) ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने शक्कर की कीमतों को राशन दुकान पर उपलब्ध कीमत से भी कम पर ला दिया था लेकिन इस बार की ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने ऐसा कोई कारनामा अंजाम नहीं दिया उल्टे सभी वस्तुओं के दाम स्थिर ही बने रहे। मतलब यह कि मतलब यह कि जिस तेजी से कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही थी, केवल उनका बढ़ना भर रुका था। इसका कारण साफ था कि यह सब जमाखोरी के चलते संभव हो पाया था और आज भी सरकार इस पर अंकुश लगा पाने में पूरी तरह नाकामयाब ही दिखती है वह केवल लोगों को यह बयान देकर अपने कर्तव्य को पूरा करने में लगी है कि सरकार द्वारा महंगाई को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं जल्द ही लोगों को महंगाई से निजात मिलेगी लेकिन ठोस उपाय करने के नाम पर मौद्रिक नीति में थोड़ा उलटफेर कर दिया जाता है।
महंगाई के मुद्दे पर सभी दलों की खामोशी ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि शासन करने की मौजूदा नीति केवल उद्योगपतियों के साथ नेताओं और अफसरों के लिए ही फायदेमंद साबित हो रही है, आम आदमी तो बस जल्द ही अपने गरीबी की रेखा में आने का इंतजार कर रहा है और तैसे-तैसे अपने दिन गुजारने को मजबूर है. मौजूदा महंगाई में सामान्य आदमी अपना गुजारा कैसे चला पा रहा है, यह उससे बेहतर और कोई नहीं जान सकता है और शासन-प्रशासन ने जनता को तो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. महंगाई के मुद्दे पर सभी दलों की खामोशी ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि शासन करने की मौजूदा नीति केवल उद्योगपतियों के साथ नेताओं और अफसरों के लिए ही फायदेमंद साबित हो रही है, आम आदमी तो बस जल्द ही अपने गरीबी की रेखा में आने का इंतजार कर रहा है और तैसे-तैसे अपने दिन गुजारने को मजबूर है.
    बिल्‍कुल सही लिखा है आपने .. बाजार मे सामान की पलबता के बावजूद कीमतों में वृद्धि का और क्‍या कारण हो सकता है ??

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  2. ये बात तो तय है कि जितनी मंहगाई होती नहीं है उससे ज्यादा उसे बना दिया जाता है,

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